सत्य बोला नहीं सत्य स्वीकार किया जाता है- स्वामी मैथिलीशरण सीधी 22 अक्टूबर

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सत्य बोला नहीं सत्य स्वीकार किया जाता है- स्वामी मैथिलीशरण

सीधी 22 अक्टूबर

प्रमुख संपादक व पत्रकार धर्मेंद्र सिंह बघेल

ज्ञान दीपक को प्रज्वलित करने के लिए श्रीरामचरित मानस में जिन साधनों की आवश्यकता का वर्णन काकभुशुण्डि जी ने किया है, वे सब के सब वे ही साधन हैं जो भक्त के जीवन में अनायास सहज ही कृपा से प्राप्त होते जाते हैं और स्वयं आ जाते हैं,
निष्काकामता, सभी शुभाशुभ कर्मों को भस्मीभूत करना, श्रद्धा सत्कर्मों का चारा, भाव का वछड़ा आदि की चर्चा करते हुए स्वामी मैथिलीशरण जी ने कहा कि ज्ञान मार्ग में भी भक्ति का समावेश आवश्यक है, सत्य में शील का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि यद्यपि मैदा में पकी हुई जलेवी भी जलेबी ही होती है पर वह जब तक वह मीठे शीरे में डुबा नहीं दी जाती है तब तक वह खाने के काम नहीं आती है। उसी प्रकार संसार में सत्य के नाम पर जो लोग अपनी वाणी का अनरगल उपयोग करके जहर उगलते रहते हैं उनका सत्य सत्य नहीं है, सत्य-सत्य का परिणाम तब देगा जब उसको शील के शीरे में डुबो कर बोला जायेगा, अर्थात दूसरों की भावना का ध्यान रखते हुए सबको सुख देने के लिए सत्य का उपयोग किया जायेगा।
पार्वती जी ने भगवान शंकर के द्वारा संपूर्ण रामकथा सुनने के बाद पुन: एक और प्रश्न खड़ा कर दिया ? और वह प्रश्न यह किया कि प्रभु! कृपाकर हमें यह बताइये कि ये रामपरायण और ज्ञानरत तथा गुणों की खान होते हुए भी इस मतिधीर काकभुशुण्डि ने यह कौऐ का शरीर कैसे पा लिया? और आपकी भेंट इनसे कैसे हो गई? कृपा कर यह बताइये, स्वामी जी ने इस प्रसंग को रामचरितमानस के भक्तमाल की कथा की संज्ञा देकर बताया कि भक्त की कथा ही भगवान की कथा है। तब शंकर जी ने पार्वती जी को उनके पूर्व जन्म की कथा सुनाकर पार्वती के ह्रदय को भक्ति और प्रेम रस से ओतप्रोत कर दिया, और कहा कि आपने पूर्व जन्म में दक्ष के घर सती रुप में जन्म लिया था और कुछ ऐसी घटना हो गई कि आपने अपने शरीर को त्याग दिया, यहाँ तक तो केवल सत्य कहा शंकर जी ने, पर एक शब्द आगे बोलकर शंकर जी ने सत्य को शील में डुबा दिया, और कहा कि-
तब अति सोच भयऊ मन मोरे।
दुखी भयउ वियोग प्रिय तेरे।।
तब तुम्हारे वियोग से मैं बहुत दुखी हो गया और उस दुख से निवृत्ति के लिए मैं संतों के पास जा जाकर कथा सत्संग सुनने लगा, उसी क्रम में मैं सुमेरु पर्वत पर पहुँच गया, जहाँ ये काकभुशुण्डि कथा कह रहा था और बड़े विशिष्ट हंस बैठकर कथा सुन रहे थे,
स्वामी जी ने कहा कि शंकर जी का सती से यह कहना कि दुखी भयउ वियोग प्रिय तोरे ही जो है यही ज्ञान का फल भक्ति है जिसमें दूसरे की भावना का ध्यान रखा जाता है। ज्ञान तभी अखण्ड रहेगा जब वह भक्ति को पोषित करेगा, और भक्ति तभी सुरक्षित रहेगी जब वह ज्ञान को समर्पित रहेगी।
कुबेर तोमर की रिपोर्ट
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