राजधानी में ही उड़ रही है बाल श्रम कानून की धज्जियां

लखनऊ। विश्व बाल श्रम निषेध दिवस के अवसर पर सरकार ने बाल श्रम के उन्मूलन के लिये लम्बे चैडे़ भाषण दिये और जिलाधिकारी ने बाल श्रम रोकने के लिये श्रम विभाग, नगर निगम, पुलिस विभाग, स्वास्थ्य विभाग और बेसिक शिक्षा विभाग की संयुक्त टीम बना दी। इस टीम को जिम्मेदारी दी गयी कि दस जून से पच्चीस जून तक चल रहे बाल श्रम निषेध पखवाड़े के दौरान वह होटलों, रेस्टोरेन्टों चाय के होटल ढाबों फैक्ट्रियों कारखानों सड़क पर ठेलों पर और सड़क पर भीख मांगने वाले चैदह साल तक आयु के बच्चों को मुक्त कराकर काम करवाने वाले मालिकान से जुर्माना वसूले।
राजधानी के वीआईपी कहे जाने वाले इलाके हजरतगंज से लेकर सभी इलाकों के होटल, रेस्टोरेंट, चाय के होटल में मात्र दो हजार से तीन हजार महीना पर सैकड़ों मासूम सुबह से देर रात तक काम करते दिखायी देते है। चाहे वह लालबाग दुर्गमा खाने का होटल हो शर्मा चाय का होटल हो या विधायक निवास के पास के छोटे होटल। गाड़ियों की मरम्मत करने वाले छोटे-छोटे गैराज हो या तालकटोरा का औद्योगिक क्षेत्र हो। ऐसे हजारों स्थान केवल राजधानी लखनऊ में ही है जहाॅ बाल श्रम कानून की धज्जियां उड रही है। हजरतगंज, कैसरबाग, आलमबाग, अवध अस्पताल चैराहे पर, महानगर, निशातगंज तथा हर माॅल के आस-पास जहाॅ पर गाड़ियों की भीड़ होती है वहाॅ पाॅच साल से दस साल तक के मासूम हाथ में कपड़ा लेकर गाड़ियों को पोछने के नाम पर भीख माॅग रहे है। खाने पीने के होटलो के पास खाने के नाम पर भीख माॅग रहे है। वही नाबालिग बच्चे ई-रिक्शा भी चला रहे है। ये सब सभी को दिखता है परन्तु श्रम विभाग, पुलिस और प्रशासन को नहीं दिखता है।
जिलाधिकारी के अनुसार चैदह वर्ष तक की आयु के बच्चों से काम करवाना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है जिसमें काम करवाने वाले नियोक्ता को न्यूनतम् छः महीने से दो वर्ष तक जेल व न्यूनतम् बीस हजार से पचास हजार रूपये के जुर्माने का प्रावधान है। नियोक्ता के साथ-साथ अभिभावक के विरूद्ध भी एसीएम कोर्ट मे धारा 107ध्16 के तहत कार्यवाही की जा सकती है। जिला बाल संरक्षण अधिकारी सचिन सिंह ने संक्षेप में बताया कि बाल श्रम निषेध के तहत अवमुुक्त कराये गये बच्चों कों बाल गृहों में रखा जाता है। जहां खाने-पीने कपड़े पढ़ाई आदि की जिम्मेदारी सरकार की होती है। प्रवर्तकता कार्यक्रम के अन्र्तगत 0 से अठारह वर्ष तक आयु सीमा के बच्चे जो शिक्षा से विरत् होकर काम कर रहे है तो उनको परिवार में पुर्नवासित किया जाता है। और यदि परिवार की वार्षिक आय ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतम् रू0 46080- तथा शहरी क्षेत्रों मंे रू0 56,000- हो को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। यदि बच्चे की माता विधवा है अथवा माता-पिता नही है, कुष्ठ रोग या एचआईवी से पीड़ित है, परिवार की आय का कोई स्रोत नही है, बाल गृहो से मुक्त कराकर परिवार में पुर्नवासित किये गये बच्चे आदि। ऐसे पात्र बच्चों को कम से कम एक तथा अधिकतम् तीन वर्ष तक रू0 दो हजार प्रति माह की वित्तीय सहायता देने का प्रावधान किया गया है। वास्तव में मात्र बाल श्रम निषेध पखवाड़ा मनाने से और केवल भाषणबाजी और टीम बना देने से बाल श्रम को रोका नही जा सकता है। जरूरत है दृढ़ इच्छाशक्ति और ईमानदारी से काम करने की वरना श्रम विभाग के अधिकारी सब जानते है कि कहां-कहां बाल श्रम कानून का उल्लघंन हो रहा है। वे निरीक्षण करने अवश्य जाते है पर केवल अपना हिस्सा लेकर अपनी आॅखें बन्द कर लेते है। श्रम विभाग के अनुसार अभी पुराने ही 215 मामले लंबित पडे़ हुये है जिनके तत्काल निस्तारण हेतु जिलाधिकारी ने निर्देशित किया गया है देखना यह है कि क्या इस पखवाड़े में पुराने मामलों का निस्तारण हो पाता है या जिलाधिकारी की बनी टास्क फोर्स कितने मासूमों को अवमुक्त कराकर सरकारी योजनाओं के तहत उनके बचपन को मुस्कान दे पाते है। केवल अकेली सरकार या जिला प्रशासन कुछ नही कर सकता है इसके लिये आम नागरिकों को भी सहयोग करना चाहिये। इसके लिये टोल फ्री नंबर 1098 या 181 भी है अपने आस-पास बाल श्रम की या भीख माॅग रहे बच्चों की सूचना इन पर दे सकते है। साथ ही स्मार्ट फोन धारक अपने फोन में पेन्सिल पोर्टल के माध्यम से ऐसे बच्चो की फोटो या जानकारी शेयर करके इनकी मदद कर सकते है। प्रशासन भी सख्ती से निर्देश दे सकता है कि जिस क्षेत्र में बाल श्रम पाया जाता है या बच्चे भीख मांग रहे है वहां उस क्षेत्र के श्रम अधिकारी और थानेदार जिम्मेदार होगे और उनकी ही जबाबदेही होगी।
