सरकारी योजनाओं का मजाक बना रहे आंगनबाड़ी केंद्र

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जबलपुर, 9 अगस्त।   शासन द्वारा आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों को सभी प्रकार की सुविधाएं मुहैया कराने लगातार प्रयास किये जा रहे हैं। मगर इन कोशिशों का विशेष असर नहीं हो रहा है। असलियत तो यह है कि सरकार तक फर्जी आंकड़े पहुंचाये जाते हैं।
और ऐसा ही हो रहा है शहरी क्रमांक 6 के कार्यक्षेत्र में आने वाली आंगनबाड़ी केंद्र मेें, कार्यकर्ता जिम्मेदारीपूर्वक इस कार्य को नहीं निभा रहे हैं। शहरी क्षेत्र रांझी के आंगनबाड़ी केंद्र 10 बजे से 11 बजे के बीच खुलते हैं जबकि यह सुबह 8 बजे खुलने चाहिए, उस वक्त वहां ताला लटका नजर आता है। टूटे फूटे भवनों, बजबजाती खुली नालियों से लगे कमरों मेें बैठने विवश हैं बच्चे। आंगनबाड़ी में आने वाले बच्चों के पीने के लिए स्वच्छ पानी की भी व्यवस्था नहीं और न ही नन्हें बच्चों के खेलकूद के लिए पर्याप्त जगह और संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
गौरतलब है कि आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों के शिक्षा व खान-पान की जो सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिए वह नहीं हो रही हैं। बच्चों को पोषण आहार के लिए जो खाद्य सामग्री उपलब्ध करायी जा रही है वह इतनी घटिया है कि बच्चे इसे नहीं खाते। इसी क्रम में जिस कंपनी का दूध पाउडर इन केंद्रों में मुहैया कराया जा रहा है वह पानी में आसानी से नहीं घुलता। फिलहाल जनचर्चा का विषय यह है कि आंगनबाड़ी केंंद्रों में बच्चों के लिए उपलब्ध पोषण आहार के पैकेट केवल पांच-पांच रूपए में लोग खरीदकर गाय भैंसों को भूसे मेें मिलाकर खिलाने में इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे यह तथ्य उजागर होता है कि यह सामग्री बच्चों के खाने लायक है ही नहीं। बहरहाल ऐसे तथ्यों के उजागर होने से यह साफ है कि शहरी क्रमांक 6 की परियोजना अधिकारी व सुपरवाईजर समय पर निरीक्षण नहीं कराते केवल कागजों मेें आंकड़ों को दर्ज कर विभागों को भेजते हैं।
महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा अनेक योजनाओं के संचालन की जिम्मेदारी भी आंगनबाड़ी केंद्रों को सौंपी गई है जिसमें –
१- पूरक पोषण आहार योजना
२- गोद भराई योजना
३- मातृ एवं शिशु रक्षा कार्ड
४- अन्न प्राशन योजना
५- लाडली लक्ष्मी योजना
६- किशोरी बालिका योजना
७- जन्म दिवस कार्यक्रम
शामिल हैं सरकार द्वारा जारी उक्त योजनाओं के संबंध में घर-घर जाकर जानकारी देने की जो जिम्मेदारी आंगनबाड़ी केंद्रों के कार्यकर्ता, सुपरवाईजर सहायिका की है इसका प्रचार प्रसार भी नहीं होता। आंगनबाड़ी केंद्रों की बदहाली के चलते लोग मजबूरन प्राइवेट स्कूलों की ओर रूख कर रहे हैं। ऐसे कुछ लोगों की लचर व्यवस्था के चलते लोग शासन की लाभकारी योजनाओं से वंचित रह जाते हैंं। जिसका खामियाजा हमारी सरकार को भोगना पड़ता है लोग शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगाते हैं।

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