पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – आलस्य, अज्ञानता और संदेह प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।

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स्वामी_अवधेशानंद_गिरि

 

 

धर्मेंद्र सिंह बघेल पत्रकार

 

 

☀ प्रभु प्रेमी संघ ?

31 जुलाई, 2022 (रविवार)

पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्

।। श्री: कृपा ।।

? पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – आलस्य, अज्ञानता और संदेह प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। इसलिए सीखने के लिए तैयार हो जाइये और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के प्रति गंभीर रहें। सरल, विनम्र और सदाचारी बनें। जीवन की सुन्दरता सादगी और नम्रता में निहित है ..! आलस्य हमारी इच्छाशक्ति को, संकल्प-शक्ति को शिथिल बनाता है।शारीरिक, मानसिक, तन-मन की उत्साह-हीनता, कर्म न करने की प्रवृत्ति, काम को टालने की आदत (दीर्घसूत्रता) को ‘आलस्य’ कहते हैं। आलस्य का रोग जिस किसी को भी जीवन में पकड़ लेता है तो फिर वह सम्भल नहीं पाता। आलस्य से देह और मन, दोनों कमजोर पड़ जाते हैं। आलसी व्यक्ति जीवनपर्यन्त लक्ष्य से दूर भटकता रहता है। किसी भी व्यक्ति की प्रगति में दूसरे लोग तो कम बाधक होते हैं, अपनी प्रगति में व्यक्ति स्वयं ज्यादा बाधक होता है। व्यक्ति की प्रगति में बाधक कारणों में सबसे बड़ा बाधक ‘आलस्य’ ही होता है, जिसके कारण असफल होने पर लोग अपने ही भाग्य को कोसते हैं। इससे निराशा और कुंठा का जन्म होता है। महात्मा बुद्ध ने कहा है कि अमृत पद यानी प्रगति चाहते हैं तो आलस का त्याग करना ही होगा। जहाँ आलस होता है, वहाँ बड़ी से बड़ी सम्पति और व्यापार नष्ट हो जाता है। यदि ऊंचाईयों पर पहुँचना चाहते हैं और अपने कार्यक्षेत्र में विशेषज्ञता प्राप्त करना चाहते हैं तो ये आज ही तय करें कि अब आलस नहीं करेंगे। यदि हमारा शिव-संकल्प दृढ़ हो तो प्रकृति की प्रत्येक शक्ति हमारा सहयोग करने को बाध्य है। दृढ़ शिव-संकल्प हो तो सृष्टि की कोई भी शक्ति लक्ष्य तक पहुँचने से नहीं रोक सकती ..।

 

? पूज्य “आचार्यश्री जी” ने कहा – सबसे पहला संकल्प आलस्य त्याग का लें क्योंकि आलस्य हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। यह शत्रु हमारी उन्नति के सभी द्वार बंद कर देता है। जब हम आलस्य पर विजय प्राप्त कर लेंगे, तभी उन्नति हमारे चरण चूमेगी। अथर्ववेद में कहा भी है – ‘कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहित ..’ अर्थात् मेरे दाएँ हाथ में कर्म पुरुषार्थ है और मेरे बाएँ हाथ में विजय विद्यमान है। सुस्त और निद्राशील लोगों को तो देवता भी पसंद नहीं करते क्योंकि देवता हमारी आस्था का जाग्रत रूप है। समय पर काम न करने वाले, व्यर्थ के विवादों में शक्ति और समय का अपव्यय करने वाले, न संकल्प कर सकते हैं और न अपने किसी वचन का निर्वाह ही कर सकते हैं। इसलिए हमारी सबसे पहली आवश्यकता है – शक्ति का सदुपयोग। और यह तभी सम्भव है जब हमारे मन में सब तरफ से श्रेष्ठ संकल्प ही आएँ ।पूज्य “आचार्यश्री जी” ने कहा कि आत्मोत्थान का संकल्प लें; अपनी कमज़ोरियों से लड़ें। अपने शुभ-गुणों के विकास का संकल्प लें। संसार के उत्थान की शुरुआत अपने उत्थान से ही होती है। अत: हम संकल्प करें कि सन्मार्ग को छोड़कर न चलें -‘माँ प्रगाम पथो वयं …’ – (ऋग्वेद)। हम दुर्गुणों को भले ही सुला दें, परन्तु अपने सद्गुणों को जगाए रखें। सभी आदमी अच्छे और सभी आदमी बुरे हो सकते हैं। कुछ लोग रात-दिन अपने दुर्गुणों के प्रेत को जगाने की मसान पूजा में लगे रहते हैं। इसी काम में अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं और एक बुरे व्यक्ति के रूप में बदनाम हो जाते हैं। कुछ व्यक्ति शुभ चिन्तन की ऊर्जा से अपने सद्गुणों को जगाए रखते हैं और एक अच्छे आदमी की छवि निर्मित कर लेते हैं। अच्छा-बुरा सब कुछ हमारे भीतर है। बुराई पलभर में किसी भी पूज्य को निंदनीय व्यक्ति बना सकती है। अत: हम संकल्प लें कि हमारे मन का ‘शिवरूप’ सदा जाग्रत रहे …।

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